होलिका दहन का पर्व इस वर्ष गुरुवार, 13 मार्च 2025 को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:35 बजे से प्रारंभ होकर 14 मार्च को दोपहर 12:23 बजे तक रहेगी।
भद्रा काल और शुभ मुहूर्त:
इस वर्ष होलिका दहन के दिन भद्रा काल का प्रभाव रहेगा, जो 13 मार्च को सुबह 10:35 बजे से रात 11:29 बजे तक रहेगा। भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, इसलिए होलिका दहन भद्रा समाप्ति के बाद ही करना उचित होगा। भद्रा समाप्ति के बाद होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 13 मार्च की रात 11:30 बजे से 12:30 बजे तक रहेगा।
होलिका दहन की पूजा विधि:
1. स्थान चयन: होलिका दहन के लिए स्वच्छ स्थान का चयन करें और वहां लकड़ियों, उपले आदि का ढेर बनाएं।
2. मूर्तियों की स्थापना: होलिका और प्रह्लाद की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ स्थापित करें।
3. पूजन सामग्री: रोली, अक्षत, फूल, माला, कच्चा सूत, गुड़, गुलाल, जल से भरा लोटा, नारियल, गेहूं की बालियां, गन्ना आदि एकत्रित करें।
4. पूजन प्रक्रिया:
होलिका को रोली, अक्षत, फूल, माला आदि अर्पित करें।
कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर तीन या सात परिक्रमाओं में लपेटें।
नारियल, गेहूं की बालियां, गन्ना आदि होलिका में अर्पित करें।
परिवार सहित होलिका की परिक्रमा करें और प्रार्थना करें कि आपके जीवन से सभी नकारात्मकता और बाधाएँ समाप्त हों।
5. दहन: शुभ मुहूर्त में होलिका में अग्नि प्रज्वलित करें और "अहकूटा भयत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:, अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम।" मंत्र का जाप करें।
6. प्रसाद ग्रहण: दहन के बाद होलिका की अग्नि में गेहूं या चने की बालियां सेंककर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।
महत्व:
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। उसने भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का प्रयास किया, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई। यह घटना सिखाती है कि सत्य और भक्ति की शक्ति के सामने कोई भी बुराई टिक नहीं सकती।
अतः, होलिका दहन का यह पर्व हमें सत्य, धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
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